Monday, Jun 25, 2007
आज रात भर
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कवि- मनीष वंदेमातरम्
स्वर- शैलेश भारतवासी
अक्षर- आज रात भर
स्रोत- हिन्द-युग्म
Posted by Hind-Yugm at 4:58 AM | 1 comments
1 Comments:
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पधारो म्हारो देशकलम घसीटों तुम्हें नमन है
मैं गुजरता रहा....
पता तो चले
धुआँ-धुआँ सा उठ रहा क्या है
ज़िंदगी अब सही नहीं जाती
अब हम से और अपने दिल को बहलाया नहीं जाता
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शैलेश
बहुत सुन्दर पढ़ा है । एक गल्ती ठीक कर दूँ -
चुभता रहा का उच्चारण चूभता रहा जैसा लगा है ।
कविता भी सुन्दर है और पढ़ते तो सुन्दर हो ही ।
सस्नेह