Wednesday, Jun 27, 2007
क्या फ़िर से?
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कवयित्री- रंजना भाटिया
स्वर- शैलेश भारतवासी
अक्षर- क्या फ़िर से?
स्रोत- हिन्द-युग्म
Posted by Hind-Yugm at 11:30 PM | 2 comments
2 Comments:
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आज रात भरपधारो म्हारो देश
कलम घसीटों तुम्हें नमन है
मैं गुजरता रहा....
पता तो चले
धुआँ-धुआँ सा उठ रहा क्या है
ज़िंदगी अब सही नहीं जाती
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शुक्रिया शैलेश जी ....बहुत ही दिल से बोला है आपने .शायद मैं भी इतना अच्छा ना बोल पाती ...शुक्रिया :)
रंजना जी की इस रचना को आज आपके मुह से सुन कर लगा की जैसे अब तक अधूरी ही थी आज यह पूर्ण हुई है...मगर क्या खूब सुनाया है जैसे कहीं कोई दिल में कसक सी है...