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Friday, Jun 29, 2007

पिता से

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कवि- गौरव सोलंकी
स्वर- शैलेश भारतवासी
अक्षर- पिता से
स्रोत- हिन्द-युग्म

Posted by Hind-Yugm at 2:42 AM |  2 comments  

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2 Comments:

shobha said...

गौरव सोलंकी की यह कविता मुझे बहुत पसन्द आयी थी ।
मैं भी इसको अपना स्वर देना चाहती थी। आज तुम्हारी आवाज़
में इसे सुनकर बहुत अच्छा लगा । कविता तो अच्छी थी ही
तुमने इसे भाव-पूर्ण शब्दों में पढ़ा है तथा और भी सुन्दर बना दिया ।
बधाई

9:07 AM
Anonymous said...

जितने प्रभावशाली शब्द हैं उतनी ही असरदार आवाज़.. बोल सुनकर आँखें नम हो गईं..

5:37 AM

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