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Friday, Jul 20, 2007

खुदा के जी में जाने क्या है

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कवि- गौरव सोलंकी
स्वर- विकास कुमार
अक्षर- खुदा के जी में जाने क्या है
स्रोत- हिन्द-युग्म

Posted by Hind-Yugm at 7:31 AM |  8 comments  

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8 Comments:

shobha said...

गौरव सोलंकी बहुत अच्छा लिखते हैं । आपने अच्छी कविता चुनी है। काश। आप उतना ही सुन्दर गा पाते ।
कोशिश करते रहिए ।

7:54 AM
Anonymous said...

बहुत सुन्दर विकासजी, अच्छा स्वर दिया है आपने!

मुझे ऐसा भान हुआ कि बैकग्राउंड में म्यूज़िक चल रहा है, क्या ऐसा था?, कैसे किया?

7:55 AM
Anonymous said...

@Shobha ji

Maaf kijiye ki main aapki aasha ke anurup nahi gaa saka. meri kamiyon ki or dhyaan dilayengi to aabhari rahoonga. sudhaar ki koshish jaari hai aur jaari rahegi.

@giriraj ji
ji haan! background me music tha.
audacity me maine track mix kiye hain.

11:23 AM
शैलेश भारतवासी said...

लगता है कविता नहीं बल्कि कहीं की समाचार-रिपोर्ट है। लाइव प्रसारण जैसी लगी। अच्छी है, अगली का इंतज़ार रहेगा।

6:56 AM
Anonymous said...

absolutely brillient!!! what a combination of emotion sorrow & the big irony of god made life

9:52 AM
Anonymous said...

samachar report ko prashansaa samjoon yaa aalochnaa ye nahi pata :) parantu Thank You shailesh ji!

aur sahi kaha aapne kranti ji! solanki ji ki lekhani bahut damdaar hai.

11:01 AM
Anonymous said...

गौरव जी की कला का तो मैं वैसे हीं पंखा (फैन) हूँ और आज उनकी रचना को सुनकर मंत्रमुग्ध हो गया। इसमें सबसे ज्यादा श्रेय विकास जी आपको जाता है। आपने बखूबी अपना स्वर दिया है। और उसपर संगीत का कमाल तो मानो सोने पर सुहागा हो।
बाकी मित्रों की तरह मुझे भी आपकी अगली पेशकश का इंतजार रहेगा।

11:21 AM
Anonymous said...

Thanks deepak ji. :)

4:37 AM

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