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Friday, Jul 27, 2007

वाचाल मौन

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कवि- विश्व दीपक 'तन्हा'
स्वर- विकास कुमार
अक्षर- वाचाल मौन
स्रोत- हिन्द-युग्म

Posted by Hind-Yugm at 5:04 AM |  9 comments  

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9 Comments:

Anonymous said...

शुक्रिया मित्र मेरे शब्दों को अपने स्वर देने के लिए । एक नई जान आ गई है मेरी रचना में , ऎसा लगता है।
-विश्व दीपक 'तन्हा'

5:19 AM
शैलेश भारतवासी said...

इसमें जहाँ जैसा दर्द होना चाहिए आवाज़ में, आपने देने की कोशिश की है। आपसे उम्मीदें बढ़ती ही जा रही हैं।

7:22 AM
Anonymous said...

तन्हा जी ने पहले ही इतना उम्दा लिखा था, ऊपर से इस कविता को आपकी आवाज ने बहुत खूबसूरत बना दिया है। संगीत भी बहुत अच्छा लग रहा था साथ साथ।
आपके स्वर ने सचमुच हिन्द-युग्म की कविताओं में चार चाँद लगा दिए हैं।

-गौरव सोलंकी

8:19 AM
shobha said...

विकास
बहुत- बहुत बधाई । यह कविता तुमने बहुत सुन्दर गाई है ।
साबित किया है कि यदि कुछ करने की लगन हो तो इन्सान
सब कुछ कर सकता है । एक बार पुन; बधाई तथा आशीर्वाद

1:22 AM
Anonymous said...

Thank You all for appreciation. :)

3:00 AM
Anonymous said...

Its like a dialogue delivery......with proper back ground music.....and felt like singer went through the real pain hidden in this poem that poet wanted to convey.....

Appki aawaz ka dard sunnewale tak gehere pahunchta hai......bahut khoob bhadhaai sweekaaren

Always
Anupama Chauhan

2:52 AM
Anonymous said...

विकासजी,

आपकी मेहनत रंग ला रही है, तन्हाजी की कविता पढ़ते वक्त जिस दर्द का एहसास हुआ था तो आपकी आवाज में स्पष्ट तौर से दिख रहा है। आपकी पिछली पॉड्स की तुलना में यह बहुत ज्यादा बेहतरीन है, इसमें यह स्पष्ट रूप से महसूस हुआ है कि आप कविता में पूर्ण रूप से डूबकर आवाज़ दे रहें है।

बहुत-बहुत बधाई!!!

3:16 AM
Anonymous said...

विकासजी,

आपकी मेहनत रंग ला रही है, तन्हाजी की कविता पढ़ते वक्त जिस दर्द का एहसास हुआ था तो आपकी आवाज में स्पष्ट तौर से दिख रहा है। आपकी पिछली पॉड्स की तुलना में यह बहुत ज्यादा बेहतरीन है, इसमें यह स्पष्ट रूप से महसूस हुआ है कि आप कविता में पूर्ण रूप से डूबकर आवाज़ दे रहें है।

बहुत-बहुत बधाई!!!

- गिरिराज जोशी "कविराज"

3:17 AM
shobha said...

विकास
तुम्हारी आवाज़ में इतना प्रभाव आ गया कि विस्मित हो रही हूँ । तुम्हारी आवाज़ हिन्द युग की ज़रूरत बन गई
लगती है । अन्य कविताओं को भी अपनी आवाज़ दो । आशीर्वाद सहित

1:26 AM

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